उज्जैन, मध्य प्रदेश: धर्मनगरी उज्जैन की पवित्र भूमि पर एक बड़ा सनसनीखेज घोटाला सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस की विशेष जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिवार और उनके रिश्तेदारों ने सीएम बनने के महज दो साल में 137 प्लॉट यानी 168 एकड़ जमीन खरीद ली है। इन जमीनों की कुल कीमत करीब ₹45 करोड़ बताई जा रही है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ये जमीनें ठीक उन्हीं इलाकों में हैं जहां मोहन यादव सरकार की घोषित सड़क परियोजनाएं, हाईवे, रिंग रोड और उज्जैन मास्टर प्लान 2035 तथा सिम्हस्थ कुंभ 2028 की तैयारियां चल रही हैं। यानी सस्ते दामों पर जमीन खरीदकर बाद में सरकारी विकास से मुनाफा कमाने का आरोप लग रहा है।
जांच रिपोर्ट के बड़े खुलासे
रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2023 में मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके परिवार के सदस्यों – पत्नी सीमा यादव, बेटे वैभव की पत्नी शालिनी यादव, भाई नंदलाल और नारायण यादव, भाभी रेखा यादव, भतीजे अभय यादव तथा चचेरे भाई गोविंद और नीलेश यादव – ने या तो सीधे या परिवार की चार रियल एस्टेट कंपनियों के जरिए ये प्लॉट खरीदे।
2025 में अकेले 62 प्लॉट (92 एकड़) खरीदे गए – ठीक उसी समय जब उज्जैन में जमीन अधिग्रहण को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। कुल मिलाकर परिवार के पास अब 335 एकड़ जमीन का लैंड बैंक हो गया है।
कांग्रेस का तीखा हमला
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जितू पटवारी ने इस मामले को “महाकाल भूमि का लूट का इंजन” बताया। उन्होंने कहा:
“तथ्य साफ बताते हैं कि भाजपा राम मंदिर के चंदे की चोरी के साथ-साथ महाकाल की भूमि की लूट में भी शामिल है। मोहन यादव को स्पष्ट करना चाहिए कि उनके परिवार की जमीन कैसे 100 एकड़ से बढ़कर 335 एकड़ हो गई? सीएम बनने के बाद इतनी तेजी से जमीनें कैसे बढ़ गईं? हम न्यायिक जांच और उनके इस्तीफे की मांग करते हैं।”
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के sitting जज की निगरानी में जांच की मांग की है और मोहन यादव को “प्रॉपर्टी डीलर सीएम” करार दिया।
परिवार और भाजपा का बचाव
परिवार के सदस्यों का कहना है कि रियल एस्टेट का कारोबार मोहन यादव के सीएम बनने से बहुत पहले से चल रहा था। एक रिश्तेदार ने कहा:
“क्या हम सिर्फ इसलिए दुकान बंद कर दें क्योंकि मोहन यादव मुख्यमंत्री बन गए हैं? हमारा कारोबार 2010 से चल रहा है, इसमें कोई गलत बात नहीं है।”
सरकार के सूत्रों ने भी दावा किया कि ये पुराना कारोबार है और इसे सीएम पद से जोड़ना गलत है। हालांकि, मोहन यादव खुद अब तक इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दे पाए हैं, जिससे सवाल और बढ़ गए हैं।
राजनीतिक गर्मी बढ़ी
समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर तंज कसा, जबकि भाजपा में आंतरिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष इस मामले को आगामी चुनावों में बड़ा हथियार बनाने की तैयारी कर रहा है।
द जनपथ न्यूज़ की टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर रखे हुए है। क्या ये विकास का फायदा या हितों का टकराव है? क्या मोहन यादव सरकार पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी? क्या न्यायिक जांच होगी?
आप क्या सोचते हैं? कमेंट सेक्शन में अपनी राय जरूर दें। क्या महाकाल की नगरी में ये जमीन खरीदारी सही है या बड़े सवाल खड़े करती है?